अर्धांगिनी हो तुम



जो सागर में उठती लहरों की
तीव्र गति हो तुम |
फिर तुमको देख प्रफुल्लित
होता पर्यटक हूँ मै |

जो बारिश उपरांत मिट्टी की
भीनी सी महक हो तुम |
फिर तुमको प्रकृति में विस्तारित
करती वायु का वेग हूं मै |

जो बागों में खिले हुए
सुन्दर लाल गुलाब हो तुम |
फिर तुमको चमक देती
सुबह की ओस की बूंद हूं मै |

जो उषा काल में निकली
सूरज की लालिमा हो तुम |
फिर तुमको समाहित करती
सागर की सतह हूँ मै |

जो ऊचाईयों को परिभाषित करता
पर्वत का शिखर हो तुम |
फिर उस शिखर को प्रकाशित करती
सूरज की किरण हूँ मै |

जो सुंदर नभ में निकले
मनमोहक इन्द्रधनुष हो तुम |
फिर तुम्हारे अस्तित्व को
बनाती सूक्ष्म जल बूंद हूँ मै |

जो घोंसले को बुनती चिड़िया का
अटूट जतन हो तुम |
फ़िर उसको आँधियों से बचाती
वृक्ष की घनी लता हूँ मै |

जो सागर में उठती लहरों की
तीव्र गति हो तुम |
फिर तुमको देख प्रफुल्लित
होता पर्यटक हूँ मै |
Satya Prakash Sharma

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