कितनी सुन्दर हो

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तुम्हारी आंखें जैसे सागर मे शंख।
तुम्हारी जुल्फ सुनहरी जितना मोर का पंख।
तुम्हारी पलकों पे लगती है घटा काली।
तुम्हारे गालों मे हो जैसे सूरज की लाली।
ये सब तुम्हे और भी हसीन बनाते हैं।
तभी तो इतनी सुन्दर हो।


तुम्हारे होठों पे है सच्चाई का श्रृंगार।
तुम्हारी हंसी मे जैसे हो कोयल की पुकार।
तुम्हारी बातें जैसे गोलगप्पे की चटकार।
तुम्हारा गुस्सा जैसे तीखी मिर्च का वार।
ये सब तुम्हे और भी हसीन बनाते हैं।
तभी तो इतनी सुन्दर हो।


तुम्हारी आहट से ही फैले फिजाओं में इत्र।
तुम्हारे एक मिलन से ही बन जाएँ मित्र।
तुम्हारे हाथों मे है फूलों की सुंदरता।
तुम्हारे नखरे उठाने से हर कोई है डरता।
ये सब तुम्हे और भी हसीन बनाते हैं।
तभी तो इतनी सुन्दर हो।
Satya Prakash Sharma

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