नकाब देखा है

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सरकारी नौकरों में
रिश्वत का ख्वाब देखा है।
गरीब के घर में भी
ईमानदारी का ख़िताब देखा है।

दूसरों की सफलता पे
जलन का शबाब देखा है।
चंद पैसों के लिए भी
रिश्ते होते ख़राब देखा है।

हर एक चेहरे पे मैंने
एक नकाब देखा है।

विफलता में उड़ाते हुए
लोगों को मज़ाक देखा है।
सफलता में गले मिलते
उनको ही बेहिसाब देखा है।

बारिश में भी चमकता हुआ
मैंने आफ़ताब देखा है।
कुछ कुबेरों को भी पढ़ते
मैंने किताब देखा है।

हर एक चेहरे पे मैंने
एक नकाब देखा है।
Satya Prakash Sharma

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